Thursday, November 18, 2010

जीवन लम्बा नहीं ईश्वर प्रेम से ओत-प्रोत होना चाहिए, जो तभी संभव हैं जब मनुष्य धरती की हरेक वस्तु में केवल परमानन्द को ही देखें, क्योंकि हर जगह सृष्टि के कण-कण में परमपिता का ही रूप ही तो व्याप्त हैं, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, आकाश, वन-उद्यान, पशु-पक्षी सभी कुछ प्रभु ने ही तो रचा हैं और ईश्वर की महानतम रचना हैं मानव जिसको भगवान ने विवेक दिया हैं, मानव शरीर और बुद्‌धि को इतना प्रखर बनाया हैं कि खुद मनुष्य भी यदि चाहे तो देवता बन सकता हैं।

Wednesday, November 17, 2010

अंधकार विशाल होता हैं,वह शक्तिवान एवं भयावह होता हैं, यह तो नींद को धन्यवाद हैं कि वह हमें विस्मृति में धकेल देती है, नहीं तो रात की यह अवधि पर्वत के समान भारी लगे। परंतु इस विशालमय रात को एक नन्हा सा दीपक चुनौती दे यह कहता हैं कि दिन का उजाला अब ज्यादा दूर नहीं। इसी प्रकार मनुष्य जीवन अंधकारमय और भयावह चुनौतियों से भरपूर हैं और ईश्वर में आस्था वह नन्हा दीपक जो हमें संदेश देता हैं कि उज्ज्वल सुनहरी सुबह नज़दीक ही हैं।

Tuesday, November 16, 2010

भगवान को पाना हैं तो निरंतर प्रयास करना होगा, मन को इस तरह से सिखाना होगा कि भगवान का ध्यान छोड़ मन कहीं और न रमे क्योंकि जिस संसार में हम रहते हैं और उसको सच समझ लेते हैं वह तो ईश्वर की रची माया के अलावा कुछ भी नहीं, इस दुनिया में परमपिता से ज्यादा कोई हमारा सगा नहीं, यह बात हम जिस दिन महसूस करने लगेगें उसी क्षण हमारे सर्वत्र कष्ट मिट जाएँगे और अपना जीवन हमें वरदान स्वरूप लगने लगेगा।

Monday, November 15, 2010

जीवन की शुरूआत रोते हुए भले हो पर जीवन का अंत हमेशा हँसते हुए करें,क्योंकि हम जब दुनिया में आते हैं तो नादान छोटे बच्चे होतें हैं परन्तु दुनिया से जाते हैं परिपक्व एवं समझदार हो कर, जीवन के सभी अनुभव लेकर, ईश्वर की अराधना हमें न सिर्फ महामानव बल्कि देवत्व तक ले जाती हैं और हर मानव के जीवन का यही तो गहन मर्म हैं।

Friday, November 12, 2010

जिस तरह जीवन भगवान का वरदान हैं उसी तरह मृत्यु ईश्वर का निमंत्रण हैं और भगवान के पास जाने से केवल वह लोग डरते हैं जो पापी और अधर्मी हैं क्योंकि उन्हे दण्ड से भय लगता हैं परन्तु भगवान के सच्चे भक्त सर्वदा मृत्यु के लिए तैयार रहते हैं।

Thursday, November 11, 2010

आकाश से ऊँचा कुछ हैं क्या, हाँ मनुष्य की अच्छाई।
जल से पतला कुछ हैं क्या, जी मनुष्य का ज्ञान।
भूमि से भारी कुछ हैं क्या, मनुष्य का पाप।
काजल से काला कुछ हैं क्या, मनुष्य का कंलक।
अग्न से तेज़ क्या है भला, मनुष्य का अंहकार।

Wednesday, November 10, 2010

जिदंगी और मौत दोनो परमात्मा के हाथ हैं,न जाने कब जीवन की डोर खिंच जाए इसीलिए जो अनमोल जीवन परमपिता का महान अनुदान हैं उसका एक भी क्षण व्यर्थ न गवाएँ, हर पल यह ही चेष्टा करें कि आप समाज के प्रति कुछ योगदान अवश्य करें। चाहे वह गरीब अनाथ की सेवा हो या भूखे को अन्नदान,जितना हो सके अपने स्तर पर ज़रूर करें।