Friday, July 9, 2010

आत्मशांति यानि मन की शांति भौतिक वस्तुयों के भोग द्वारा मिलना असंभव हैं, वह तो केवल मन की श्रेष्ठता से मिलती हैं जो कि स्वयं मनुष्य के भीतर हैं, जिस प्रकार सोना आग में तप के और निखरता हैं उसी प्रकार मनुष्य जीवन रूपी ज्वार भाटे में हिचकोले खाकर ही मंजिल(परमात्मा) तक पहुँच सकता हैं।

Thursday, July 8, 2010

सभी महापुरूषो एवं संतो ने बार-बार सभी तरह की धार्मिक ग्रंथो में बारम्बार उस परमसत्ता का गुणगान किया हैं जो कि सृष्टि के हर नन्हें कण में व्याप्त हैं। ईश्वर हरेक के हृदय में विराजमान हैं इसीलिए हमें प्रत्येक व्यक्ति का समान रूप से आदर करना चाहिए एवं किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए।

Wednesday, July 7, 2010

संसार के हरेक कार्य को यह सोच ही करना चाहिए कि इसमें ईश्वर की इच्छा विद्यमान है, तभी मनुष्य उस कार्य को सफलता पूर्वक समाप्त कर सकता हैं, अन्यथा वह सदा ही खिन्न प्रवृति से कार्य करेगा और अंत में निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। सिर्फ उपल्बधियों का ध्यान न रख प्रतिकूलताओं पर भी नितांत विचार करें।

Tuesday, July 6, 2010

आपने पाला हमें भी, उसे भी
हम जानते हैं हर वो पल जिसमें आपने जीवन सँवारा हमारा
वो तो सब भुला बैठे!
हम कभी भूल न पाए जो प्यार-दुलार मिला आपसे
वो तो सब गवा बैठे!
पर एक बागबान(ईश्वर) है कि वह दोनो से ही करता हैं
बेतहाशा प्रेम!

Monday, July 5, 2010

माँ शब्द एक ऐसी सुदंर अनुभूति हैं कि जो सोचते ही होठों पर एक मधुर मुस्कान आ जाती हैं, माँ वो है जो बच्चे की हर पीड़ा हर वेदना समझती हैं, माँ वह है जो अपना सब कुछ वार बच्चो पर न्यौछावर कर देती है, पर जो बच्चे माँ को नहीं समझ सकते, उसके प्रेम को नहीं जान पाते वह न सिर्फ नादान हैं बल्कि जीवन के हर रिश्ते से अनिभिज्ञ एवं उदासीन हैं एवं उन्हें ईश्वर भी माफ नहीं कर पाते क्योंकि जो बच्चे माँ की कदर करना नहीं जानते उनकी किस्मत में ठोकरों के अलावा कुछ नहीं रखा हैं जोकि देर या सवेर उन्हें मिल कर ही रहेंगी।

Friday, July 2, 2010

जीवन को सार्थक एवं सफल बनाने के लिए अपना पूरा प्रयत्न, पूरी शक्ति एवं आयु लगानी पड़ती हैं, तब कहीं जाकर सफलता प्राप्त होती हैं, परन्तु कुछ लोग तो बगैर प्रयत्न करे ही सफलता की अपेक्षा करते हैं एवं अनितिपूर्ण व्यवहार अपनाते हैं जो कि सर्वथा अनुचित हैं, मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी समूची ताकत से अपने कर्तव्य की पूर्ति करें एवं सही समय आने पर सफलता की प्राप्ति निश्चित हैं।

Thursday, July 1, 2010

जिस प्रकार भोर होने से पहले रात्रि का अंतिम प्रहर गहन कालिमा से परिपूर्ण होता हैं उसी प्रकार वर्तमान युग की स्थिति भी निरंतर बुरी होती जा रही हैं, परन्तु हमें ईश्वर पर भरोसा रख सदा संघर्ष जारी रखना चाहिए कि नव युग का निर्माण अब दूर नहीं, और उस श्रेष्ठ एवं नवीन युग की स्थापना से पूर्व सभी बुराईयों का सपष्ट होना नितांत आवश्यक हैं।