पुरूषः स परः पार्थ भक्तया लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥
अर्थात उस परमपुरूष (परमात्मा) की प्राप्ति, जिसके भीतर सारे प्राणी स्थित हैं और जिससे सब कुछ व्याप्त हैं, अनन्य्भक्ति द्वारा ही संभव हैं।
Monday, April 12, 2010
Friday, April 9, 2010
Wednesday, April 7, 2010
Tuesday, April 6, 2010
Monday, April 5, 2010
Friday, April 2, 2010
झूठ नहीं बोलना चाहिए,परन्तु कड़वा एवं अप्रिय सच भी किसी को नहीं बोलना चाहिए। दूसरों को नुकसान न पहुँचे, किसी की भावना को ठेस न पहुँचे ऐसी बात बोलनी चाहिए,ऐसी बोली गई बात झूठ होकर भी सौ सच के बराबर हैं।उसी प्रकार जिस बात से किसी को पीड़ा पहुँचे, किसी का मन आहत हो ऐसी कही गई बात सच होकर भी झूठ के बराबर ही हैं।
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