Tuesday, February 8, 2011

जिस प्रकार एक बीज डालने से वो पहले पौधा और फिर वृक्ष बनता है उसी प्रकार हर मनुष्य का मूल केवल और केवल परम पिता परमेश्वर हैं। जब मनुष्य अपने इस मूल से विमुख हो जाता है तभी उसका जीवन अशांत और उथल-पुथल हो जाता है उसे सदा मृत्यु का भय लगा रहता है। परन्तु अपने मूल स्रोत ईश्वर से एकाकार होने पर मनुष्य के सभी डर मिट जाते हैं और उसे हर निर्णय लेने की क्षमता आ जाती है यही सार्थकता है अपने मूल स्रोत से संबंध बनाए रखने की क्योंकि अंतिम संबंध तो उन्ही से जुड़ा रहेगा और सभी से बिछुड़ जाना है।

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